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KEDAR DARPAN (केदार दर्पण)

उत्तराखंड

जिलाधिकारी सविन बंसल की न्याय प्रणाली की हो रही वाह वाही….

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देहरादून: महज उम्रदराज होना बहु-बेटे और बच्चों को बेघर करने का लाइसेंस नहीं है। यह बात जिलाधिकारी न्यायालय के एक अहम फैसले से साबित हो गई है।दरअसल, एक सेवानिवृत्त राजपत्रित अधिकारी पिता ने फ्लैट की लालसा में अपने ही अल्पवेतनभोगी बीमार बेटे, बहु और 4 वर्षीय पौती को घर से बेदखल करने की कोशिश की थी। उन्होंने भरण-पोषण अधिनियम के तहत डीएम कोर्ट में वाद दाखिल किया….लेकिन सुनवाई में हकीकत कुछ और ही निकली।

डीएम कोर्ट ने पाया कि पिता-माता खुद 55 हजार मासिक आय अर्जित करते हैं और पूरी तरह सक्षम हैं, जबकि बेटा प्राइवेट नौकरी कर मुश्किल से 25 हजार रुपए कमाता है। पिता का उद्देश्य केवल परिवार को बेघर करना था।

फैसले की खास बातें.….

डीएम ने महज दो सुनवाई में ही स्थिति परखते हुए लाचार दंपति को घर का कब्ज़ा वापस दिलाया।पिता द्वारा दायर झूठा वाद खंडित कर दिया गया।एसएसपी को बेटे-बहु और बच्ची की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।आदेश में साफ कहा गया कि कानून की आड़ में लाचारों का हक नहीं छीना जा सकता।

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